Friday, July 1, 2022

हिंदु संस्कृती

 हिंदुओं #जानो #अपने #धर्म और #संस्कृति के #बारे #मे  

पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर    2. भीम    3. अर्जुन
4. नकुल।      5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन      2. दुःशासन   3. दुःसह
4. दुःशल        5. जलसंघ    6. सम
7. सह            8. विंद         9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष       11. सुबाहु।   12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण।   14. दुर्मुख     15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण     17. शल       18. सत्वान
19. सुलोचन   20. चित्र       21. उपचित्र
22. चित्राक्ष     23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद।       26. दुर्विगाह  27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द।        32. उपनन्द   33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा    35. सुवर्मा    36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु   38. महाबाहु  39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग  42. भीमबल
43. बालाकि    44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण       47. कुण्डधर  48. महोदर
49. चित्रायुध   50. निषंगी     51. पाशी
52. वृन्दारक   53. दृढ़वर्मा   54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति  56. अनूदर    57. दढ़संघ 58. जरासंघ   59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा   62. उग्रसेन     63. सेनानी
64. दुष्पराजय        65. अपराजित 
66. कुण्डशायी        67. विशालाक्ष
68. दुराधर   69. दृढ़हस्त    70. सुहस्त
71. वातवेग  72. सुवर्च    73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी   75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि    78. क्रथन। 79. कुण्डी 
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर  82. वीरबाहु
83. अलोलुप  84. अभय  85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय    87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी।     89. विरवि
90. चित्रकुण्डल    91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि    93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान     95. दीर्घबाहु
96. सुजात।         97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी        99. विरज
100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )

"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-

ॐ . किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई। 

ॐ . कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।

ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।

ॐ. कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी 

ॐ. कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।

ॐ. कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में

ॐ. क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।

ॐ. कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय

ॐ. कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक

ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। 

ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा 
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने

ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को

ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में

ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।

ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद

ॐ. गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना

ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85 
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.

अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद

अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।

33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार। 
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-

12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार है :- 
रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी 

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है
तो इस जानकारी को अधिक से अधिक
लोगो तक पहुचाएं। ।




📜😇  दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष , 
शुक्ल पक्ष !

📜😇  तीन ऋण -

देव ऋण , 
पितृ ऋण , 
ऋषि ऋण !

📜😇   चार युग -

सतयुग , 
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग , 
कलियुग !

📜😇  चार धाम -

द्वारिका , 
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी , 
रामेश्वरम धाम !

📜😇   चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम ) 
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) , 
शृंगेरीपीठ !

📜😇 चार वेद-

ऋग्वेद , 
अथर्वेद , 
यजुर्वेद , 
सामवेद !

📜😇  चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य , 
गृहस्थ , 
वानप्रस्थ , 
संन्यास !

📜😇 चार अंतःकरण -

मन , 
बुद्धि , 
चित्त , 
अहंकार !

📜😇  पञ्च गव्य -

गाय का घी , 
दूध , 
दही ,
गोमूत्र , 
गोबर !

📜😇  पञ्च देव -

गणेश , 
विष्णु , 
शिव , 
देवी ,
सूर्य !

📜😇 पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल , 
अग्नि , 
वायु , 
आकाश !

📜😇  छह दर्शन -

वैशेषिक , 
न्याय , 
सांख्य ,
योग , 
पूर्व मिसांसा , 
दक्षिण मिसांसा !

📜😇  सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज , 
गौतम , 
अत्री , 
वशिष्ठ और कश्यप! 

📜😇  सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी , 
माया पुरी ( हरिद्वार ) , 
काशी ,
कांची 
( शिन कांची - विष्णु कांची ) , 
अवंतिका और 
द्वारिका पुरी !

📜😊  आठ योग - 

यम , 
नियम , 
आसन ,
प्राणायाम , 
प्रत्याहार , 
धारणा , 
ध्यान एवं 
समाधि !

📜😇 आठ लक्ष्मी -

आग्घ , 
विद्या , 
सौभाग्य ,
अमृत , 
काम , 
सत्य , 
भोग ,एवं 
योग लक्ष्मी !

📜😇 नव दुर्गा --

शैल पुत्री , 
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा , 
कुष्मांडा , 
स्कंदमाता , 
कात्यायिनी ,
कालरात्रि , 
महागौरी एवं 
सिद्धिदात्री !

📜😇   दस दिशाएं -

पूर्व , 
पश्चिम , 
उत्तर , 
दक्षिण ,
ईशान , 
नैऋत्य , 
वायव्य , 
अग्नि 
आकाश एवं 
पाताल !

📜😇  मुख्य ११ अवतार -

 मत्स्य , 
कच्छप , 
वराह ,
नरसिंह , 
वामन , 
परशुराम ,
श्री राम , 
कृष्ण , 
बलराम , 
बुद्ध , 
एवं कल्कि !

📜😇 बारह मास - 

चैत्र , 
वैशाख , 
ज्येष्ठ ,
अषाढ , 
श्रावण , 
भाद्रपद , 
अश्विन , 
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष , 
पौष , 
माघ , 
फागुन !

📜😇  बारह राशी - 

मेष , 
वृषभ , 
मिथुन ,
कर्क , 
सिंह , 
कन्या , 
तुला , 
वृश्चिक , 
धनु , 
मकर , 
कुंभ ,
मीन!

📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग - 

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल , 
ओमकारेश्वर , 
बैजनाथ , 
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ , 
त्र्यंबकेश्वर , 
केदारनाथ , 
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

📜😇 पंद्रह तिथियाँ -

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी , 
पंचमी , 
षष्ठी , 
सप्तमी , 
अष्टमी , 
नवमी ,
दशमी , 
एकादशी , 
द्वादशी , 
त्रयोदशी , 
चतुर्दशी , 
पूर्णिमा , 
अमावास्या !

📜😇 स्मृतियां - 

मनु , 
विष्णु , 
अत्री , 
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना , 
अंगीरा , 
यम , 
आपस्तम्ब , 
सर्वत ,
कात्यायन , 
ब्रहस्पति , 
पराशर , 
व्यास , 
शांख्य ,
लिखित , 
दक्ष , 
शातातप , 
वशिष्ठ !

हिन्दू धर्म की 10 महत्वपूर्ण बातें ........

१...10 ध्वनियां :  1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग

२,,,,10 कर्तव्य:- 1. संध्यावंदन, 2. व्रत, 3. तीर्थ, 4. उत्सव, 5. दान, 6. सेवा 7. संस्कार, 8. यज्ञ, 9. वेदपाठ, 10. धर्म प्रचार। आओ जानते हैं इन सभी को विस्तार से।

३,,,,10 दिशाएं : दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं।

४....10 दिग्पाल : 10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत।

५.….10 देवीय आत्मा : 1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर।

६.....10 देवीय वस्तुएं : 1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और संजीवनी बूटी।

७....10 पवित्र पेय : 1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस

८....10 महाविद्या : 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

९....10 उत्सव : नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि।

१०...10 बाल पुस्तकें : 1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह।

११....10 पूजा : गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, तुलसी विवाह पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा।

१२...10 धार्मिक स्थल : 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं।

१३..10 पूजा के फूल : आंकड़ा, गेंदा, पारिजात, चंपा, कमल, गुलाब, चमेली, गुड़हल, कनेर, और रजनीगंधा।

१४...10 धार्मिक सुगंध : गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली।

१५...10 यम-नियम :1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान।

१६...10 सिद्धांत : 
1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है, 
3.पुनर्जन्म होता है, 
4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है, 5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है, 6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है, 
7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है, 
8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है, 9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है, 
10.दान ही पुण्य है।

॥ हरे कृष्णा हरे कृष्ण 
कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥
॥ हरे राम हरे राम
॥ राम राम हरे हरे ॥



तिरुपती_बालाजी यांना गोविंदा म्हणून का म्हटले जाते ?

एक विस्मयकारक आणि अतिशय मनोरंजक गोष्ट आहे ....

महालक्ष्मीच्या शोधात भगवान विष्णु जेव्हा भुलोकीला आले तेव्हा एक सुंदर घटना घडली.
जेव्हा त्यांनी भुलोकात प्रवेश केला, तेव्हा त्यांना तहान आणि भुक यासारखे मानवी गुण मिळाले,भगवान श्रीनिवास एकदा ऋषी अगस्त्य यांच्या आश्रम स्थानात गेले आणि म्हणाले, "#मुनिंद्र, मी एका विशिष्ट  आहे. 
मला माहित आहे की तुमच्याकडे अनेक गायींसह एक मोठी गोशाळा आहे. तेव्हा माझ्या गरजा भागविण्यासाठी तुम्ही मला एक गाय देऊ शकता का? "

ऋषी अगस्त्य हसले आणि म्हणाले, "स्वामी, मला चांगले माहित आहे की आपण श्रीनिवास यांच्या मानवी स्वरूपात श्री विष्णु आहात. मला खूप आनंद आहे की या विश्वाचा निर्माता आणि शासक माझ्या आश्रमात आला आहे, पण मी आपली माया जाणतो व मला हे देखील माहित आहे की तूम्ही माझी भक्ती तपासण्यासाठी हा मार्ग अवलंबला आहात. "

"तर स्वामी, माझी एक अट आहे की माझ्या गोशाळेतील पवित्र गाय केवळ अशा व्यक्तीला मिळाली पाहिजे जो त्याच्या पत्नीबरोबर येईल. मला तुम्हाला गाय भेटवस्तू म्हणून द्यायला नक्कीच आवडेल परंतु जेव्हा तुम्ही माझ्या आश्रमात देवी लक्ष्मीसह याल आणि गो दान देण्यासाठी विचाराल तेव्हाच मी तसे करू शकेन. तोपर्यंत मला क्षमा करावी. "

श्रीनिवासन हसले आणि म्हणाले, "ठीक आहे, मुनिद्र, तुम्हाला जे पाहिजे होते ते मी नक्की करीन. "आणि ते त्यांच्या जागी परतले.

नंतर भगवान श्रीनिवासांनी देवी पद्मावतीशी विवाह केला. विवाहाच्या काही दिवसांनंतर, भगवान श्रीनिवास त्यांच्या दिव्य पत्नी पद्मवतीबरोबर ऋषी अगत्स महामुनींच्या आश्रमात आले. पण त्यावेळी ऋषि आश्रमात नव्हते. भगवान श्रीनिवासाना त्यांच्या शिष्यांनी विचारले की"आपण कोण आहात आणि आम्ही आपल्यासाठी काय करू शकतो?"
प्रभुने उत्तर दिले, "माझे नाव श्रीनिवास आहे आणि ही माझी पत्नी पद्मावती आहे.

मी आपल्या आचार्यना माझ्या रोजच्या गरजा भागविण्यासाठी एक गाय दान करण्यास सांगितले. पण त्यांनी सांगितलेले की बायकोसोबत येऊन दान मागितले तरच गायदान देईन ,अशी तुमच्या आचार्यांची अट होती. म्हणून मी आता सपत्नीक आलो आहे व मी येण्याची बातमी तुमच्या आचार्यना माहिती आहे का?"
शिष्य म्हणाले की"आमचे आचार्य आश्रमात नाहीत , म्हणून कृपया आपली गाय घेण्यासाठी पुन्हा परत या. "ऋषीच्या शिष्यांनी नम्रपणे सांगितले.

#श्रीनिवासन हसले आणि म्हणाले, "मी सहमत आहे. परंतु मी संपूर्ण ठिकाणचा सर्वोच्च शासक आहे म्हणून तुम्ही सगळे शिष्यगण माझ्यावर विश्वास ठेवू शकता आणि मला एक गाय देऊ शकता. मी पुन्हा येऊ शकत नाही "
शिष्य म्हणाले "कदाचित आपण या ठिकाणचे शासक आहात किंवा हे संपूर्ण विश्वही तुमचे असू शकते. परंतु आमचे दिव्य आचार्य आम्हासाठी सर्वोच्च आहे आणि त्याच्या नजरेत व त्यांच्या परवानगीशिवाय आम्ही कोणतीही गोष्ट करणार नाही, "जिद्दी शिष्यांनी उत्तर दिले.

हळू हळू हसत हसत पवित्र भगवान म्हणाले, "मी तुमच्या आचार्यबद्दल आदर करतो. कृपया परत आल्यावर आचार्यांना सांगा की मी सपत्नीक येऊन गेलो, असे म्हणून भगवान श्रीनिवास परत वळले आणि तिरुमाला सात टेकड्यांच्या दिशेने जाऊ लागले.

काही मिनिटांनीच, #ऋषी_अगस्त्य आश्रमात परतले आणि जेव्हा त्यांनी आपल्या शिष्यांकडून त्यांच्या अनुपस्थितीत श्रीनिवासच्या आगमनानंतर ऐकले तेव्हा त्यांना अत्यंत नैराश्य आले."श्रीमन नारायण स्वतः लक्ष्मीसह माझ्या आश्रमात आले होते तेव्हा दुर्दैवाने मी आश्रमात नव्हतो ,खुप मोठा योग माझ्याकडून हुकला ,तरीही काही हरकत नाही पण श्रीना हवी असलेली गाय मला दिलीच पाहिजे " व ऋषि ताबडतोब गोशाळेत दाखल झाले आणि एक पवित्र गाय घेऊन भगवान श्रीनिवास आणि देवी पद्मावती यांच्या दिशेने धावत निघाले.

थोड्या अंतरावर धावल्यानंतर त्यांना श्रीनिवासन व त्यांच्या पत्नी #पद्मावती दृष्टीक्षेपात आले. त्यांच्या मागे धावत ऋषीनी तेलुगू भाषेत हाक मारायला चालू केली.
"स्वामी(देवा) गोवु(गाय)इंदा (घेऊन जा)(तेलुगूमधील गोवु म्हणजे गाय आणि इंदा म्हणजे घेऊन जा.
स्वामी, गोवु इंदा .. स्वामी, गोवु इंदा .. स्वामी, गोवु इंदा.. स्वामी, गोवु इंदा .. .. (स्वामी, ही गाय घ्या) .. स्वामी, गोवु इंदा .. स्वामी, गोवु इंदा .. स्वामी, गोवु इंदा .. स्वामी, गोवु इंदा ..

"पण तरीही भगवान मागे वळले नाहीत ......
इकडे मुनींनी गती वाढवली आणि त्यांनी हाक मारताना बोललेल्या शब्दाबद्दल विचार करायला सुरुवात केली .. महान ऋषींनी विचार केला की ते 'स्वामी गोवु इंदा म्हणत आहेत पण भगवंताची लीला आहे की त्या शब्दांचे रुपांतर काय झाले?

"स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंद .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. स्वामी गोविंदा .. गोविंदा गोविंदा. गोविंदा .. गोविंदा .. गोविंदा ..
गोविंदा .. गोविंदा .. गोविंदा .. "

ऋषींनी ओरडल्यानंतर भगवान श्रीनिवास वेंकटेश्वर व देवी पद्मावती परत वळले आणि ऋषींकडून पवित्र गाय स्वीकारली व म्हणाले,
"प्रिय मुनींद्रा, तुम्ही ज्ञात किंवा अज्ञातपणे आता माझे सर्वात आवडते नाव गोविंदा 108 वेळा घेतले आहे. 

मी कलीयुगांतापर्यंत या पवित्र टेकड्यांवर मूर्तीच्या स्वरूपात भुलोकामध्ये रहात आहे, मला माझें सर्व भक्त गोविंदा या नावाने संबोधतील. "
"या पवित्र सात टेकड्यांवर माझ्यासाठी एक मंदिर बांधले जाईल आणि दररोज मला पाहण्यासाठी मोठ्या संख्येने भक्त येत राहतील. हे भक्त, या टेकड्यांवर चढत असताना किंवा मंदिरात माझ्या समोर असताना ते मला या गोविंदा नावावरून हाक मारतील "

"कृपया मुनिंवर लक्षात ठेवा, प्रत्येक वेळी मला या नावाने संबोधले जाते तेव्हा तुम्हालाही स्मरले जाईल कारण या प्रेमळ नावामागे तुम्हीच आहात.
जर कुठल्याही कारणास्तव कोणताही भक्त माझ्या मंदिरात येण्यास असमर्थ असेल व माझ्या गोविंदा नावाचा जप करेल तर त्याच्या सर्व आवश्यक गोष्टींची पूर्तता करेन. "
"सात पवित्र पर्वतावर चढत असताना जो कोणी गोविंदा या पवित्र नावाचे 108 वेळा नाम घेईल त्या सर्व श्रद्धावानांना मी मोक्ष देईन."

"वेंकटारमण_गोविंदा"

गुरूनामाचा महिमा

 महाराजांच नाम घेताना सहज सुचल ते मांडण्याचा प्रयत्न केलाय.


गुरूनामाचा महिमा अलौकिक अाहे. गुरूनामाने जड जीवांचा उध्दार होतो.
याच गुरूनामातील प्रत्येक अक्षरातून बोध घेतला अाणि त्याचा अंगीकार केला तर असीम अानंदात हसत हसत हा भवसागर तरणे सहज शक्य होईल.

अ— अहंकाराचा त्याग करा.

नं— नंतर करू न म्हणता वेळेत  काम करा.

त— तरतमभाव जागृत ठेवा.

को—कोणाचीही निंदा नालस्ती नको.

टि— टिका टिप्पणी करणे वर्ज करा.

ब्र— ब्रम्हचैतन्याचा वास सर्वांत अाहे ही जाणीव ठेवून वर्तन करा.

म्हां — म्हातारपणी मिळतेजूळते घेऊन रहा.

ड— डगमगून न जाता संकटांचा सामना करा.

ना— नाम जपो वाचा नित्य, श्वासातही नाम अशी स्थिती व्हावी.

य— यत्किंचितही लोभ धरू नको.
 
क— कर्तृत्वावर विश्वास ठेव. कष्ट कर.

गु—गुरूवर निरंतर श्रध्दा असावी.

रू— रूपापेक्षा गुणांना महत्त्व द्या.

ग— गर्व नको. गरजूंना मदत करा.

जा — जात पात धर्म पंथ विसरून माणूसकी जपा.

न— नसेल त्याचे दूःख करण्यापेक्षा असेल त्यात समाधानी रहा.

न— नम्रता अंगी बाणा.

म — मन प्रेमळ,निर्मळ असू द्या.
मनातील वाईट विचारांवर अंकुश घाला.

हा— हाव लालसा दूर सारा.

रा— रात्रंदिन गुरूअाज्ञेचे पालन करा.

ज— जनमानसात अापली प्रतीमा स्वच्छ ठेवा.

न — नजरेत सर्वांप्रती दया,कणव असावी.

मो— मोहमायेला भूलू नका.

स्तु — स्तुती व्हावी म्हणून कर्म करू नये. स्तुतीने हुरळूनही जाऊ नये.

ते — तेजोमय जीवन बनवा.

जय गजानन🌹🙏

का वाचावी ज्ञानेश्वरी ?

   ज्ञानेश्वरी वाचण्याचा उपयोग काय? रत्नागिरीच्या एका मोठ्या कंपनीत मोठ्या हुद्द्यावर असलेले श्रीयुत शाम चिकणे लिहितात “माझ्या मुलीला बोन मॅरो ट्रांस्प्लांटसाठी पुण्याच्या एका इस्पितळात चार महिने ठेवण्याची आमच्यावर वेळ आली. बोन मॅरो साठी मीच 'डोनर' होतो. मोठाच कठीण काळ. सहनशीलतेची परीक्षा घेणारा. हॉस्पिटल मध्ये कष्ट करत असताना आणि आतून चिंतांनी ग्रासलेला असूनही चेहरा सतत हसरा ठेवायची कसरत करायची होती. फ़क्त आणि फ़क्त ज्ञानेश्वरीच्या तत्त्वज्ञानाने या परीक्षेतून मला निभावून नेलं. वाचताना खूप सोपं साधं वाटतं सगळं. पण आयुष्यात जेव्हा असा कठीण काळ येतो तेव्हा शक्ती, ऊर्जा देणारं हे तत्त्वज्ञान आहे.” आयुष्य म्हणजे सरळ रेषा नव्हे. ECG वर सरळ रेषा उमटली की आयुष्य संपलं असं डॉक्टर म्हणतात. ज्याच्या आयुष्यात चढ उतार आले नाहीत तो तसाही जगला म्हणताच येत नाही. या कठीण काळाला 'लिमिट' ही नसतं. सिनेमाच्या अडीच तासा सारखं याला टाईम लिमिट नाही. आणि शेवटी हिरो जिंकणारच याची खात्रीही नाही.  किंबहुना जिंकणं आणि हरणं असं काही नसतंच. असतं फ़क्त लढणं. अर्जुनासारखं. कधी शत्रूशी. कधी आप्तांशी. कधी स्वतःशी सुद्धा. म्हणून ज्ञानेश्वरी वाचावी.

🙏मित्रांनो ! ज्ञानेश्वरी म्हणजे पोथी नव्हे. ज्ञानेश्वरी म्हणजे भगवद्‍गीतेचे निरूपण. जीवनाची सर्व अंगे जीवंतपणे जगणारा गोपाल, दही दुध माखन चोरणारा कन्हैय्या, कंसासारख्या पाप्याला संपवणारा चिरतरूण श्रीकृष्ण ! त्याचे ते विचार!  आणि सांगितली ती कोणाला? तर जग जिंकण्याची पात्रता अंगी बाळगणार्‍या तरूण अर्जूनाला. हे तर तरुणांचेच पुस्तक. हे म्हणजे एक मॅनेजमेंटचे पुस्तकच समजा. लाईफ़ची मॅनेजमेंट. जीवन कसे जगावे याचे तत्त्वज्ञान.
🙏तेराव्या अध्यायातली ही ओवी बघा. जरी खोल जमिनीत, मुळांना पाणी असे सापडत. 
असती मग पाने फ़ुले बहरत, बाहेर अर्जुना॥
कोंभाचे टवटवीतपण, सांगे भूमीचे सुपीकपण
तैसे ज्ञान्याचे आचरणावरून, आकळे ज्ञान ॥
🙏माऊली किती सुंदर शब्दांत हे सांगतात. तुमचे आयुष्य बाहेरून जर सुंदर दिसायचे तर त्यासाठी जमीन आणि पाणी म्हणजे ज्ञान. ते ज्ञान स्पष्ट असले पाहिजे. तरच बाहेर त्याचा आविष्कार होईल. ज्ञानेश्वरी केवळ वाचण्यासाठी नाही. शोषण्यासाठी आहे. रिचवण्यासाठी आहे.पचवण्यासाठी आहे. 🙏ज्ञानेश्वरी वाचा. समजा. पचवा. मग आपल्या जीवनातल्या अवघड प्रश्नांना सामोरे जा बरे! बघा. बरेचसे प्रश्न चुटकीसरसे संपून जातील.
ई साहित्य प्रतिष्ठानचे ई ज्ञानेश्वरी अभियान सुरू झाल्यापासून अनेक तरूण मंडळी नेटवर ज्ञानेश्वरी वाचतात. दिवसाला तीन ते चार हजार नवीन वाचक अध्याय वाचतात. काही लोकांना या घटनेचे आश्चर्य वाटते. पण आम्हाला वाटते की ज्ञानेश्वरी ही तरुणांनीच वाचायला हवी. वेळ काळ न बघता. दिवसाला अगदी एक ओवी वाचली तरी चालेल. हे पुस्तक एका  तरुणां ने लिहीले आहे ना? मग ते सिनियर सिटिझन्सनीच वाचावे असा आग्रह का? अर्थात सव्वा लाख वाचकांतले सर्वच जण इतके उत्साही नाहीत. पण आम्ही ज्ञानेश्वरी सर्वांना देतो. प्रत्येक मराठी माणसाच्या डेस्कटॉपवर किंवा मोबाईलमध्ये ज्ञानेश्वरी असावी.भले वाचा किंवा नका वाचू. जेव्हा तहान लागेल तेव्हा विहिरीपाशी या. विहीर तुमच्या जवळ आहे. ज्ञानेश्वरीतील तत्त्वज्ञान निवृत्तीचं नाहीच. संपूर्ण ज्ञानेश्वरीत कुठेही जीवनाशी फ़टकून वागण्याचा सल्ला नाही.  कुठेही साधू बनून संसाराचा त्याग करण्याचा उपदेश नाही. उलट जीवनाला आनंदाने सामोरे जाण्यासाठी ज्ञानेश्वरीतले असंख्य दाखले देता येतील.
🙏माऊली म्हणतात :
इंद्रिया न कोंडी, भोगासी न सोडी
अभिमान न सोडी, स्वजातीचा ॥
कुलधर्म ते आचरून, विधीनिषेध ते पाळून सर्व सुखॆ भोगून, मुक्ती आहे ॥ ज्ञानेश्वरी हे जीवन कसे जगावे याचा दाखला आहे. life management चं हे पुस्तक. ते वाचायला हवं.ते आचरणात आणायला हवं. त्याचा आनंद घ्यायला हवा.ज्ञानेश्वरीची खरी  गरज आहे ती आयुष्याच्या सुरुवातीलाच हातपाय गाळून बसलेल्या असंख्य तरुणांना.निराशेच्या गर्तेत सापडलेल्या.अभ्यासाच्या आणि स्पर्धेच्या बोज्याखाली दबलेल्या तरुणांना.जीवनाचा आनंद न घेता एखाद्या ओझ्याप्रमाणे आयुष्याचा प्रत्येक क्षण पुढे लोटणार्‍या तरुणांनी ज्ञानेश्वरी वाचायला हवी. वर्तमानपत्रांत आत्महत्यांच्या बातम्या वाचल्या की हे अधिक जाणवते.आज आम्हाला अशा असंख्य तरुणांची पत्रे येतात. ज्ञानेश्वरी वाचल्यामुळे आयुष्यात घडून येणार्‍या आमुलाग्र बदलाची. दृष्टिकोनात बदल झाल्यामुळे आयुष्याचा आनंद घेणार्‍या तरुणांची. काळजीचे अभ्र दूर झाल्यामुळे जीवनात प्रकाश पसरलेल्या तरुणांची.परदेशातून. खेड्यापाड्यातून. मुंबई पुण्यातूनही. हैद्राबाद, हरयाणातून.ज्ञानेश्वरी वाचा. ज्ञानेश्वरी भेट द्या. आपल्या आप्तांना द्या. ज्यांना काळजीत बघताना आपल्याला दुःख होते अशा तरुणांना द्या. नैराश्याने घेरलेल्या तरुणांना ज्ञानेश्वरी  द्या.घरातल्या मोठ्या मंडळींना द्याच,पण लहान मुलांना द्या.ज्यांच्या आयुष्याचं सोनं व्हावं अशा तरूणांना द्या. वाचायचा आग्रह नका करू हवं तर.पण त्यांच्या डेस्कटॉपवर असू द्या.शेवटी ज्ञानाचा क्षण जेव्हा यायचा तेव्हाच येतो.

पंढरीची युग संख्या

  युग म्हणजे दीर्घकाळ, युग म्हणजे कृत, त्रेता, द्वापर आणि कली.युगाच्या प्रारंभीच्या संध्याकाळाला व अंतिम काळाला अंश (भाग, खंड) म्हणतात. या दोन्हींसह चार युगांचे चक्र पूर्ण होण्यास देवांक १२००० वर्षे लागतात. देवांच्या वर्षाप्रमाणे कृत (सत्य) ४८०० वर्षे, त्रेता ३६०० वर्षे, द्वापर २४०० वा

   कली १२०० वर्षे लागतात. यामध्ये १०० वर्षांच्या संख्येत असणारा जो संधीकाळ त्यालाच युग म्हणतात.
मनुष्याचे १ वर्ष देवतांचा १ दिवस म्हणून व देवतांचे १ वर्ष मनुष्याच्या ३६० वर्षांबरोबर आहे. याप्रमाणे
मानवीय कालगणनेनुसार कलीयुगात ४३२०००वर्षे याच्या दुप्पट द्वापर, तिप्पट त्रेता व चौपट कृत युग अशी
चार युगे व त्यांची संख्या आहे. नामदेवराय पंढरीची युग संख्या व ब्रह्मदेवाच्या आयुष्याचे वर्णन करतात.
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"कृत त्रेता द्वापर कली । ऐसा चौयुगांचा मेळीं । ते महायुग शब्द आढळी । वेदांतशास्त्री ॥ १ ॥ ऐसा ब्रह्मयाचा दिनांतर । तैसीच रात्र एक सहस्र । तीसा दिवसांचा प्रखर । एक मास ।। २ ।। ऐसे बारा मास । त्याचे एक वरुष । शतभरी आयुष्य । ब्रह्मयाचें ॥३॥ ऐसा ब्रह्मयाचा दिनांत शत वरुषे गणीत | ज्या प्रळयीं पोहत । मार्कडेय उदकीं ॥ ४ ॥ ऐसी अठ्ठावीस युगे जाण । पंढरपुरासी जालीं पूर्ण । जो की ब्रह्मयाचा दिन । प्रळय काळ ॥ ५॥ नामा म्हणे पंढरीची संख्या । सांगितली संत महंत लोकां । लसूनि पादुका । विठोबाच्या ॥६॥"
(ना. गा. - ४१५)
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संत तथा भक्तशिरोमणी नामदेवराय पंढरीची युग संख्या सांगताना म्हणतात; कृत, त्रेता, द्वापर व कली अशी ही चार युगे असून यालाच वेद शास्त्रात 'महायुग' असा शब्द आहे. ब्रह्मदेवाचा दिवस म्हणजे सहस्र महायुगे व तेवढीच रात्र होय. अशा तीस दिवसांचा प्रकाशमान असा एक महिना होय. असे बारा महिने म्हणजे त्याचे एक वर्ष. अशी शंभर वर्षे ब्रह्मदेवाचे आयुष्य होय. अशा या ब्रह्मदेवाच्या दिवसाचे सहस्र युगांचे गणित केले असता त्याचा प्रलयकाळ होतो. त्या प्रलयाच्या उदकात मार्कंडेय महामुनी पोहतात. ब्रह्मदेवाच्या दिवसापासून ते प्रलयकाळापर्यंत अठ्ठावीस युगे पंढरपूरला पूर्ण झाली आहेत.
 संत नामदेवराय म्हणतात, मी श्रीपांडुरंगाच्या पादुकांना पाहून, साक्ष ठेवून पंढरीची युग संख्या संत महंतांना
सांगितली. हा अभंग भागवतातील मन्वन्तरादी कालगणना तसेच ब्रह्मदेवाचा दिवस त्याचे स्वरूप स्पष्ट करणारा आहे. जगाची उत्पत्ती, स्थिती आणि लय यांना कारणीभूत असणाऱ्या श्रीमहाविष्णूच्या नाभिकमला पासून उत्पन्न झालेल्या ब्रह्मदेवाचे आयुष्य शंभर वर्षे आहे. चार युगे एक हजार वेळा येऊन गेली म्हणजे ब्रह्मदेवाचा एक दिवस होतो. तेवढ्याच लांबीची त्याची एक रात्र असते. ब्रह्मदेवाच्या एका दिवसात चौदा मनु होतात. एका मनुत एक्काहत्तर महायुगे होतात. एका महायुगाची वर्षे ४३ लक्ष २० हजार आहेत. सध्या सातवे वैवस्वत मन्वन्तर आहे. त्यातील २७ महायुगे जाऊन २८ वे महायुग सुरू आहे. “युगे अठ्ठवीस विटेवरी उभा । वामांगी रखुमाई दिसे दिव्य शोभा ।।" :युगे अठ्ठावीस कटीवर हात ठेवून विटेवर उभे असणाऱ्या श्रीपांडुरंगाचे दर्शन घेऊन आपण कृतार्थ होऊ या.
पंढरीची युग संख्या आहे जरी । सखा पांडुरंग उभा विटेवरी ।।
🙏 पुरूषोत्तम गं.निकते.
       मो..नं.९४२००८८३०९
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५६ भोग म्हणजे काय?

श्रीकृष्णाला नैवेद्य म्हणून अर्पण केल्या जाणा-या ५६ भोगाची माहिती.

देवाला ५६ प्रकारचे पक्वान्न वाढले जातात. त्यालाच छप्पन भोग असं म्हणतात. हे पक्वान्न रसगुल्ल्यापासून सुरू होतात त्यात दही, भात, पुरी, पापड असं सगळं असून ही सामग्री वेलचीवर संपते. अष्टोप्रहार भोजन करणा-या बालकृष्णाला अर्पण केल्या जाणा-या या ५६ भोगाच्या छान कथा आहेत.

दिवसाचे आठ प्रहर असतात. असं म्हटलं जातं की यशोदा बालकृष्णाला दिवसभरात आठ वेळ जेवायला वाढायची. इंद्राच्या प्रकोपामुळे लोकांना वाचवण्यासाठी श्रीकृष्णाने गोवर्धन पर्वत उचलला होता तेव्हा जवळपास ७ दिवस अन्न आणि पाणी ग्रहण केलं नव्हतं. आठव्या दिवशी कृष्णाने इंद्राचा प्रकोप कमी झालेला पाहिला, पाऊस थांबला तेव्हा त्याने गाववाल्यांना घरी जायला सांगितलं.

मात्र कृष्णाने सात दिवस काहीच खाल्लेलं नाही याचं तिथल्या गावकऱ्यांना, यशोदेला अतिशय दु:ख झालं. म्हणूनच कृष्णाप्रती आपली भक्ती म्हणून गावकरी आणि यशोदेने ७ दिवस आणि ८ प्रहर (वेळा) असे ७ ७ ८ = ५६ इतके पदार्थ करून कृष्णासमोर ठेवले. श्रीमद् भगवदनुसार गोपिकांनी श्रीकृष्णासारखा पती मिळावा म्हणून एक महिना यमुना नदीत स्नान केलं आणि कालीमातेची प्रार्थनाही केली.

कृष्णानेही त्यांना तशीच संमती दिली. त्यांच्या व्रताची समाप्ती झाल्यावर गोपिकांनी आनंदाने कृष्णासाठी छप्पन भोग दिले. हे छप्पन भोग म्हणजे त्याच्या ५६ मैत्रिणी होत्या. असंही म्हटलं जातं की त्या काळात कृष्ण राधासंगे एक मोठया कमळावर बसायचे. त्या कमळाला तीन भाग होते.

एका भागात आठ, दुस-या भागात सोळा आणि तिस-या भागात बत्तीस पाकळ्या होत्या. प्रत्येक पाकळीवर एक प्रमुख सखी आणि मध्यभागी श्रीकृष्ण स्वत: विराजमान होत असत. याप्रमाणे पूर्ण पाकळ्यांची संख्या छप्पन होत असे. असाच याचा अर्थ सांगितला जातो. हे छप्पन भोग पुढीलप्रमाणे आहेत.:-

» भक्त (भात),

» सूप (डाळ),

» प्रलेह (चटणी),

» सदिका (कढी),

» दधिशाकजा (दही-ताकाची कढी),

» सिखरिणी (शिखरण),

» अवलेह (सरबत),

» बालका (बाटी),

» इक्षू खेरिणी (मुरंबा),

» त्रिकोण (शर्करायुक्त),

» बटक (वडा),

» मधू शीर्षक (मठरी),

» फेणिका (फेणी),

» परिष्ट (पुरी),

» शतपत्र (खजला),

» सधिद्रक (घेवर),

» चक्राम (मालपुआ),

» चिल्डिका (चोला),

» सुधाकुंडलिका (जिलेबी),

» धृतपूर (मेसू),

» वायुपूर (रसगुल्ला),

» चन्द्रकला (पगी हुई),

» दधि (महारायता),

» स्थूली (थुली),

» कर्पूरनाडी (लौंगपुरी- लवंगलतिका),

» खंड मंडल (खुरमा),

» गोधूम (दलिया),

» परिखा,

» सुफलाढया (सौंफयुक्त),

» दधिरूप (बिलसारू),

» मोदक (लड्ड),

» शाक (साग),

» सौधान (अधानौ अचार),

» मंडका (मोठ),

» पायस (खीर)

» दधि (दही),

» गोघृत,

» हैयंगपीनम (मक्खन),

» मंडुरी (मलाई),

» कूपिका (रबडी),

» पर्पट (पापड),

» शक्तिका (सीरा),

» लसिका (लस्सी),

» सुवत,

» संघाय (मोहन),

» सुफला (सुपारी),

» सीता (वेलची),

» फल,

» तांबूल,

» मोहन भोग,

» लवण,(मीठ)

» कषाय,

» मधुर,

» तिक्त,

» कटू,

» अम्ल

  चार युगांचे अनंत फेरे सुरुच राहणार. प्रत्येक युगातील सृष्टीच्या उत्पत्ती.. स्थिती आणि लय याचे स्वामी म्हणजे ब्रह्मदेव.. विष्णू आणि महेश. जे या विश्वाला आधार देण्यासाठी श्रीदत्त स्वरुपात प्रकटलेत.

       राग.. लोभ.. मोह.. व्देष.. मत्सर हे सर्वांना जन्मतःच सोबत येतात, मग कुणी कितीही श्रेष्ठ असो. अगदी जगताची धूरा सांभाळणाऱ्यां ब्रम्हा, विष्णू आणि महेश यांच्या पत्नींचीही यातून सुटका नव्हती. पण जेव्हा अहंकाराचा अतिरेक झाला तेव्हा मात्र सत्वगुण रक्षणासाठी श्री दत्तात्रेयांना प्रकट व्हावेच लागले. या जीवनात या तिन्ही गुणाचे तारतम्य रहावे.. त्यामुळे जीवन आनंदी व्हावे हा उपदेश देण्यासाठी श्रीदत्त गुरु प्रकटले.

        जेव्हा प्रत्यक्ष ब्रम्हा, विष्णू, महेश हे बालरुपात अत्री ऋषींच्या आश्रमात रांगत होते, तिघांनाही अनसूया माता घास भरवत होती, तेव्हाचे हे दृश्य आजही सुखावते. ते आश्रमातील दृश्य बघून आजही सारे हर्षभरीत होतात.

         श्री दत्तगुरुंचे कोणत्याही फोटोतील सुंदर रुप बघताच अंतरंगात भक्तीभाव उचंबळतो. सोबतचे ते चारही श्वान जे वेदांचे प्रतीक आहेत, ते सुद्धा कृतज्ञतेने नतमस्तक झाले आहेत. तर जगन्माता गाय ही त्यांना कौतुकाने बघतेय. 

        जेव्हा दत्तगुरुंची शुंभकर पाऊले या घराला लागतात तेव्हा घराचे मंदिर होते. आनंदाला पारावर नसतो. हे हृदयपाखरु स्वानंदात घरभर फिरते. हे देवा ही सारी तुमचीच किमया आहे. सभोवती तुम्हीच विहारासाठी आनंद तरंग निर्माण केलेत.

        आज हे खेबूडकर यांचे भक्तीगीत अत्यंत लोकप्रिय आहे. पण चित्रपटातील प्रसंगाची गरज म्हणून ते त्यांनी लिहलेय. जगात सारेच पापभिरु. पोटासाठी कधीकधी मार्ग बदलला तरीही पुन्हा मनात मूळ सदप्रवृत्ती कायमच असते. याच सद्सद्विवेक बुद्धीने चित्रपट कथेतील चोर ज्या घरात नाव न सांगता राहतात.. त्या घरात त्यांना प्रेम आपुलकी लाभते. चांगल्या घरचे अन्न खाल्ल्याने त्या चोरांचे मनपरीवर्तन होते. ते चोर त्या घरातील समस्या सोडवून आनंद निर्माण करतात. 

        तेव्हा त्या चोरांविषयी कृतज्ञता व्यक्त करणारे हे गाणे जे आज भक्तीगीत ठरलेय. श्रीदत्त गुरुंनी ठरवले तर काय अशक्य आहे, जीवनात आमुलाग्र परिवर्तन घडते.. जीवन मनःशांतीने आनंदी होते, हेच इथे सांगायचे होते. ही होती खेबूडकर लेखणीची कमाल.


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  १. केळी- *प्रवासात असताना जर मळमळण्याचा, उलटी होण्याचा त्रास होत असेल तर एखादं केळ खावं. बस स्टँडवर, फळांच्या दुकानात सहजासहजी उपलब्ध असणा...