Thursday, December 8, 2022

--तुलसी कथा---

 *🌹🙏।।श्री स्वामी समर्थ।। 🙏🌹

                *🔸तुलसी कथा.🔸*
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*संकलन- सदानंद पाटील, रत्नागिरी.*
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           *जालंधर नांवाचा एक अत्यंत पराक्रमी राक्षस होता. त्याने अनेकांना जिंकून वैभव प्राप्त केले होते. त्याची पत्नी वृंदा ही एक महान पतिव्रता स्त्री होती. तिच्या पातिव्रताच्या जोरावरच तो अजिंक्य झाला होता. जालंधराचा युध्दात पराभव करावा, यासाठी विष्णुने एक कपट कारस्थान रचले. विष्णुने जालंधराचे रूप धारण केले, व त्याच रूपात तो वृंदा जवळ राहू लागला. वृंदेचे पातिव्रत्य भंग झाले. त्यामुळे जालंधर लढाईच्या मैदानात मारला गेला. हे सारे वृंदेच्या लक्षात आल्यावर तिने विष्णुला शाप दिला, व स्वत: सती गेली. तिने अग्नीकाष्टे भक्षण केली. तिच्या मृत्यूच्या ठिकाणी एक वनस्पती उगवली ती "तुळस" होय. त्यामुळेच विष्णुला तुळस ही प्रिय आहे असे सांगतात.*

           *द्वापार युगातील एक घटणा..! कृष्ण अवतार झाला, आणि त्या वेळी वृंदेने रूक्मिणी होऊन कृष्णाशी कार्तिक शुध्द द्वादशीस लग्न केले, त्या वेळेपासून तुळशी विवाह समारंभ प्रचलित झाला, असे मानतात.*

           *घरातील लग्नसमारंभ साजरा करतो, त्याच उत्साहाने घरोघरी तुळशी विवाह साजरा केला जातो. तुळस ही पतिव्रता स्त्रीचे प्रतिक आहे. तिच्या निमित्ताने आपण पतिव्रता धर्माचे स्मरण करतो. तुळस ही थंडी, ताप, खोकला यावर गुणकारी औषध मानली जाते. उष्णतेच्या विकारांसाठी तुळशीला च्या बीयांचा ऊपयोग होतो. भाजणे, जळणे, गांधीलमाशी चावणे यावर तुळशीच्या मूळाजवळील माती लावतात, त्यामुळे थंडावा मिळतो. आपल्या जीवनास उपयुक्त असा प्राणवायू तुळशीद्वारे मिळतो. अशी ही औषधी आणि बहुगुणी वनस्पती आपल्या घरात ठेवण्यात पूर्वजांची दूरदृष्टी दिसून येते. तुळशीच्या लग्नात तुळस ही वधु व बाळकृष्ण हा वर आणि ऊस हा मामा असे मानले जाते.*
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[05/11, 5:11 pm] +91 80803 59473: *तुलसी कौन थी?*
```तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.
वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.
एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` -
स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प
नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।
फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।
भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे
ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।
सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे
सती हो गयी।
उनकी राख से एक पौधा निकला तब
भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से
इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में
बिना तुलसी जी के भोग```
```स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में```
```किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !```
*इस कथा को कम से कम दो लोगों को अवश्य सुनाए आप को पुण्य अवश्य मिलेगा। या चार ग्रुप मे प्रेषित करें।*

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