Wednesday, August 17, 2022

 *एक बहुत ही सुंदर कविता*


बार बार पढें.......
और आनंद ले इस कविता का...
                 👇

जो कह दिया वह *शब्द* थे ;
जो नहीं कह सके
वो *अनुभूति* थी ।।
और,
जो कहना है मगर ;
कह नहीं सकते,
वो *मर्यादा* है ।।

*जिंदगी* का क्या है ?
आ कर *नहाया*,
और,
*नहाकर* चल दिए ।।

*बात पर गौर करना*- ----

*पत्तों* सी होती है
कई *रिश्तों की उम्र*,
आज *हरे*-------!
कल *सूखे* -------!

क्यों न हम,
*जड़ों* से;
रिश्ते निभाना सीखें ।।

रिश्तों को निभाने के लिए,
कभी *अंधा*,
कभी *गूँगा*,
और कभी *बहरा* ;
होना ही पड़ता है ।।

*बरसात* गिरी
और *कानों* में इतना कह गई कि---------!
*गर्मी* हमेशा
किसी की भी नहीं रहती ।।

*नसीहत*,
*नर्म लहजे* में ही
अच्छी लगती है ।
क्योंकि,

*दस्तक का मकसद*,
*दरवाजा* खुलवाना होता है;
तोड़ना नहीं ।।

*घमंड*-----------!
किसी का भी नहीं रहा,

*टूटने से पहले* 
*गुल्लक* को भी लगता है कि ;
*सारे पैसे उसी के हैं* ।

जिस बात पर ,
कोई *मुस्कुरा* दे;
बात --------!
बस वही *खूबसूरत* है ।।


थमती नहीं,
*जिंदगी* कभी,
किसी के बिना ।।
मगर,
यह *गुजरती* भी नहीं,
अपनों के बिना....!!!

            *****************************************************



*मैने यह poem चार बार पढ़ी फिर भी मन नही भरा*
 
*कहाँ पर बोलना है*
*और कहाँ पर बोल जाते हैं।*
*जहाँ खामोश रहना है*
*वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।*

*कटा जब शीश सैनिक का*
*तो हम खामोश रहते हैं।*
*कटा एक सीन पिक्चर का*
*तो सारे बोल जाते हैं।।* 

*नयी नस्लों के ये बच्चे*
*जमाने भर की सुनते हैं।*
*मगर माँ बाप कुछ बोले*
*तो बच्चे बोल जाते हैं।।*

*बहुत ऊँची दुकानों में*
*कटाते जेब सब अपनी।*
*मगर मज़दूर माँगेगा*
*तो सिक्के बोल जाते हैं।।*

*अगर मखमल करे गलती*
*तो कोई कुछ नहीँ कहता।*
*फटी चादर की गलती हो*
*तो सारे बोल जाते हैं।।*

*हवाओं की तबाही को*
*सभी चुपचाप सहते हैं।*
*च़रागों से हुई गलती*
*तो सारे बोल जाते हैं।।*

*बनाते फिरते हैं रिश्ते*
*जमाने भर से अक्सर हम*
*मगर घर में जरूरत हो*
*तो रिश्ते भूल जाते हैं।।*
 
*कहाँ पर बोलना है*
*और कहाँ पर बोल जाते हैं*
*जहाँ खामोश रहना है*
*वहाँ मुँह खोल जाते हैं।।*

*यह कविता बार बार पढ़े।आपको हर बार एक नया अहसास होगा।*🙏

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