Friday, December 16, 2022

हरिवंशराय बच्चन की..... अंदर तक झकझोर देने वाली ये कविता

 *हरिवंशराय बच्चन की*  

*अंदर तक झकझोर देने*
*वाली ये कविता*

ना दिवाली होती, 
और ना फटाके बजते, 
ना ईद की अलामत, 
ना बकरे शहीद होते। 

तू भी इन्सान होता, 
मैं भी इन्सान होता,
काश कोई धर्म ना होता
काश कोई मजहब ना होता....

ना अर्ध देते, 
ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, 
ना विसर्जन होता। 

जब भी प्यास लगती,
नदियों का पानी पीते। 
पेड़ों की छांव होती, 
नदियों का गर्जन होता। 

ना भगवानों की लीला होती,
ना अवतारों का नाटक होता, 
ना देशों की सीमा होती,
ना दिलों का फाटक होता। 

ना कोई झूठा काजी होता, 
ना लफंगा साधु होता। 
ईन्सानियत के दरबार मे, 
हम सबका भला होता। 

तू भी इन्सान होता,
मैं भी इन्सान होता,
काश कोई धर्म ना होता.....
काश कोई मजहब ना होता....

कोई मस्जिद ना होती, 
कोई मंदिर ना होता। 
कोई दलित ना होता, 
कोई काफ़िर ना होता। 

कोई बेबस ना होता, 
कोई बेघर ना होता। 
किसी के दर्द से कोई
 बेखबर ना होता। 

ना ही गीता होती, 
और ना कुरान होती। 
ना ही अल्लाह होता, 
ना भगवान होता। 

तुझको जो जख्म होता,
मेरा दिल तड़पता। 
ना मैं हिन्दू होता,
ना मुसलमान होता। 

तू भी इन्सान होता, 
मैं भी इन्सान होता।

🙏🌹🌺🌸💐🙏
तो जरा सोचो मेरे दोस्तो, कितना अच्छा हुआ होता? 
🌹🙏🙏🙏🙏🌺

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